UGC का नया नियम: शिक्षा नहीं, शक और विभाजन का सिलेबस , पढ़ाई छोड़िए, पहले अपनी जाति स्पष्ट कीजिए

UGC के नए नियम को लेकर तीखी बहस छिड़ी है। आलोचकों का कहना है कि यह भेदभाव रोकने की बजाय शिक्षा व्यवस्था और समाज को बाँट रहा है।

1. UGC का नया नियम: पढ़ाई छोड़िए, पहले अपनी जाति स्पष्ट कीजिए

UGC का नया नियम: पढ़ाई छोड़िए, पहले अपनी जाति स्पष्ट कीजिए

भारत की शिक्षा व्यवस्था में अब ज्ञान से पहले पहचान ज़रूरी है।
डिग्री से पहले जाति,
और सवाल पूछने से पहले सावधानी।
उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकने के नाम पर University Grants Commission द्वारा लाया गया नया नियम सुनने में जितना नेक लगता है, ज़मीन पर उतना ही खतरनाक और विभाजनकारी दिखाई देता है। यह नियम भेदभाव को खत्म करने से ज़्यादा, उसे संस्थागत स्थायी भाव देने जैसा लग रहा है।
अब कैंपस नहीं, शक का अखाड़ा
अब तक यूनिवर्सिटी में सवाल ये होते थे—
सिलेबस पूरा होगा या नहीं?
रिज़ल्ट समय पर आएगा या नहीं?
प्लेसमेंट मिलेगा या नहीं?
अब नए युग का सवाल है—
“अगर कुछ गलत हो गया, तो आरोपी कौन बनेगा?”

2. नियम जो पहले फैसला करता है, बाद में जांच

नियम जो पहले फैसला करता है, बाद में जांच

यह नियम हर शिक्षक को संभावित अपराधी और हर बातचीत को संभावित शिकायत बना देता है। पढ़ाई अब ज्ञान का लेन-देन नहीं, बल्कि कानूनी जोखिम प्रबंधन बनती जा रही है।
नियम जो पहले फैसला करता है, बाद में जांच
UGC का नया ढांचा इस धारणा पर खड़ा है कि:
भेदभाव हर जगह है
और उसका स्रोत पहले से तय है
यानी जांच से पहले निष्कर्ष।
यह न्याय नहीं, पूर्वाग्रह का आधिकारिक संस्करण है।

3. जातिगत व्याख्या के चश्मे से देखा जाएगा।

जातिगत व्याख्या के चश्मे से देखा जाएगा।

जिस व्यवस्था में शिकायत दर्ज होना ही आधा दोष मान लिया जाए, वहाँ न संवाद बचता है, न भरोसा—सिर्फ़ डर बचता है।
शिक्षा में भी “हम बनाम वो”?
भारत पहले ही समाज के हर कोने में बँटा हुआ है।
धर्म, भाषा, क्षेत्र, राजनीति—सब जगह खाई।
अब शिक्षा भी उसी रास्ते पर?
इस नियम के बाद छात्र छात्र को छात्र नहीं देखेगा,
वह देखेगा—कौन सा वर्ग, कौन सी श्रेणी।
और शिक्षक पढ़ाते समय यह नहीं सोचेगा कि “समझ आया या नहीं”
बल्कि यह सोचेगा— “कहीं यह बात कल शिकायत में न बदल जाए।”
रोज़मर्रा की क्लास, असाधारण विवाद
कल्पना कीजिए—
किसी छात्र को कम नंबर मिले
किसी को डांट पड़ी
किसी से सख़्त सवाल पूछा गया
अब यह अकादमिक मामला नहीं रहेगा।
अब यह जातिगत व्याख्या के चश्मे से देखा जाएगा।

4. भेदभाव रोकने के नाम पर नया भेदभाव विडंबना देखिए

भेदभाव रोकने के नाम पर नया भेदभाव विडंबना देखिए

हर सामान्य घटना असाधारण आरोप में बदल सकती है।
और हर शिक्षक अपनी कुर्सी पर नहीं,
कटघरे में बैठा महसूस करेगा।
भेदभाव रोकने के नाम पर नया भेदभाव
विडंबना देखिए— जो नियम बराबरी की बात करता है,
वही नियम सबसे पहले लोगों को अलग-अलग खानों में बाँट देता है।
यह कहा जा रहा है— “हम जाति नहीं देखते”
और उसी सांस में पूरी व्यवस्था जाति के इर्द-गिर्द खड़ी कर दी जाती है।
अगर जाति इतनी ही अप्रासंगिक है,
तो हर नियम उसी के इर्द-गिर्द क्यों घूम रहा है?
शिक्षा या सामाजिक प्रयोगशाला?
UGC का काम शिक्षा को बेहतर बनाना है,
समाज पर वैचारिक प्रयोग करना नहीं।
लेकिन यह नियम ऐसा लगता है मानो
यूनिवर्सिटी को सोशल एक्सपेरिमेंट लैब बना दिया गया हो—

5. सुप्रीम कोर्ट तक क्यों पहुँचा मामला?

सुप्रीम कोर्ट तक क्यों पहुँचा मामला?

जहाँ हर इंसान को पहले उसकी पहचान के आधार पर तौला जाएगा,
फिर उसकी बात सुनी जाएगी।
सुप्रीम कोर्ट तक क्यों पहुँचा मामला?
इसी असहजता, इसी डर और इसी अविश्वास के चलते
यह मामला अब Supreme Court तक पहुँचा है।
जनहित याचिका में सीधा सवाल है—
क्या यह नियम निष्पक्ष है?
क्या यह संविधान के समानता के अधिकार से मेल खाता है?
या यह सिर्फ़ समाज को और गहराई से बाँटने का दस्तावेज़ है?
भरोसा खत्म, फाइलें ज़्यादा
शिक्षा व्यवस्था भरोसे से चलती है।
जब भरोसा खत्म होता है,
तो फॉर्म बढ़ते हैं,
कमेटियाँ बनती हैं,
और डर स्थायी हो जाता है।
UGC का यह नियम भी वही कर रहा है— पढ़ाई कम,
फाइल ज़्यादा।

6. क्या हर सामाजिक समस्या का समाधान एक ही वर्ग को दोषी ठहराकर निकाला जाएगा?

क्या हर सामाजिक समस्या का समाधान एक ही वर्ग को दोषी ठहराकर निकाला जाएगा?

इस नियम के खिलाफ वही आवाज़ें सबसे तेज़ हैं जो बरसों से यह सवाल उठाती रही हैं कि क्या हर सामाजिक समस्या का समाधान एक ही वर्ग को दोषी ठहराकर निकाला जाएगा? इन लोगों का कहना है कि आज अगर शिक्षा में कोई खामी दिखती है, तो उसका कारण सिस्टम की नाकामी है—न कि किसी एक जाति की मौजूदगी। लेकिन नए नियम में सिस्टम से ज़्यादा पहचान पर उँगली उठाने की सुविधा दी जा रही है, और यही सबसे बड़ा खतरा बताया जा रहा है।
विरोध करने वाले यह भी पूछते हैं कि जब कोई नियम यह मानकर चलता है कि उत्पीड़क पहले से तय है, तो निष्पक्ष जांच की ज़रूरत ही क्या रह जाती है? उनका तर्क है कि शिकायतकर्ता को सुना जाना ज़रूरी है, लेकिन बिना प्राथमिक जाँच के माहौल बनाना कि “गलती तो सामने वाले की ही होगी”, यह न न्याय है, न सुधार। यह तो सीधा-सीधा नैरेटिव जस्टिस है—जहाँ फैसला पहले और प्रक्रिया बाद में आती है।
इन आलोचकों की एक और बड़ी आपत्ति यह है कि यह नियम बौद्धिक असहमति को भी अपराध की श्रेणी में ला सकता है। आज अगर कोई शिक्षक सवाल पूछ ले, बहस कर ले, या सख़्त अकादमिक मानक लागू कर दे, तो उसे तुरंत सामाजिक चश्मे से देखा जाएगा। उनका कहना है कि इस तरह के नियम अंततः खामोशी पैदा करते हैं, जहाँ लोग पढ़ाने से ज़्यादा बचाव में जीते हैं—और यही किसी भी शिक्षा व्यवस्था की सबसे बड़ी हार होती है।

7. निष्कर्ष

निष्कर्ष

इरादा अच्छा, असर जहरीला
कोई यह नहीं कह रहा कि भेदभाव नहीं होता।
लेकिन हर समस्या का समाधान
नया नियम और नया शक नहीं होता।
अगर समाधान ही समाज को और ज़्यादा बाँट दे,
तो उस समाधान पर सवाल उठाना ज़रूरी है।
UGC का यह नया नियम
शायद इरादे से सुधार है,
लेकिन असर में
विभाजन का सिलेबस लगता है।
और यही सबसे बड़ा खतरा है।